दहेज प्रथा: वरदान या अभिशाप

कहते हैं ईश्वर उन्ही को सौभाग्य प्रदान करते हैं, जिनके घर मे बेटियां जन्म लेती हैं.

उनके नन्हे पदम साक्षात माँ लक्ष्मी के पदम होते हैं जो परिवार को धन धान्य से शुशोभित कर देते हैं इसलिए बिटिया के आगमन पर सब यही हैं कि बधाई हो घर मे लक्ष्मी आयी है, फिर क्यों उसी पुत्री के विवाह का समय आता है तो,

प्रथम प्रश्न ये आता है कि दहेज कितना देना है.

आश्चर्य कि लक्ष्मी स्वरूपा उस कन्या के विवाह के लिए एक पिता को वर पक्ष से भावतोल करना पड़ता है.

कहते हैं जोड़िया ईश्वर बनाते हैं तो क्यों हम इस दैविक रिश्ते मैं लेन देन का व्यापार डालकर इसको स्वरूप ही बदल देते हैं. पूर्वकाल मे विवाह मैं कन्या के साथ भेंट स्वरूप उपहार आदि देने का चलन था पर वो सदैव ही इस पर निर्भर था कि पिता भेंट मैं क्या देना चाहता है पर कब ये चलन एक परंपरा मैं फिर जरूरत मैं बदल गया, पता ही नही चला. आज युग बदल गया, जीवनशैली बदल गयी पर दहेज प्रथा समाप्त होने की जगह प्रतिदिन बलवती होती जा रही है. आज एक पिता अपने बच्चों को पढ़ा लिखा कर आत्मनिर्भर बनाता है, उनकी उच्च शिक्षा पर यत्न से खर्च करता है पर जब उनके विवाह की बात आती है तो पलड़ा हमेशा वर पक्ष का ही भारी क्यों होता है.

एक पुत्री जो पढ़ी लिखी है, आत्मनिर्भर है उसको जीवनसाथी खोजने के लिए दहेज क्यों देना पड़े, जबकि आज पति पत्नी दोनों ही मिलकर कमाते भी हैं और परिवार की जिम्मेदारी भी अच्छे से उठा सकते हैं.

दहेज प्रथा हमारे जाट समाज के लिए जो मेहनत और आत्मा के लिए जाना जाता है एक अभिशाप है जिसका सबको विरोध करना चाहिए.

आओ मिलकर इस प्रथा का बहिष्कार करें एवं हमारे समाज से इस रुढ़िवादी कुरुति को समाप्त करने का प्रयत्न करें.

हमारा उद्देश्य: दहेज रहित विवाह
By: Jeewansangam.com

Who we are:

Inspired by many intellectuals who are giving their best efforts for the betterment of community, we have decided that we must also bear some responsibility and hence we have decided to provide a platform for the youth of our community for choosing their life partner without any hassle.

We hope that every member of the JAT SAMAJ will join us with our mission and become a part of the team.

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